एक लफ्ज मोहब्बत का इतना सा फसाना है, सिमटे तो दिल-ए-आशिक बिखरे तो जमाना है। #Shayari by Shubh


 एक लफ्ज मोहब्बत का इतना सा फसाना है,
 सिमटे तो दिल-ए-आशिक बिखरे तो जमाना है।
 #Shayari by Shubh 

No comments:

Post a Comment

जिसके होने से मैं खुद को मुक्कम्मल मानता हूँ, में खुदा से पहले मेरी माँ को जानता हूँ। #Shyari by Shubh

 जिसके होने से मैं खुद को मुक्कम्मल मानता हूँ,  में खुदा से पहले मेरी माँ को जानता हूँ।  #Shyari by Shubh